संजय सरावगी — प्रदेश अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी, बिहार — अप्रैल 2026

2005 में बिहार में फिरौती के लिए अपहरण के 411 दर्ज मामले थे। एक उद्योग था। नंबर थे, एजेंट थे, रेट कार्ड थे। एक व्यवसायी की कीमत उसकी कंपनी की बैलेंस शीट से तय होती थी। एक डॉक्टर की कीमत उसके क्लिनिक की औसत मासिक कमाई से। बच्चों की कीमत स्कूल की फ़ीस से। यह कोई रूपक नहीं है। यह सीआईडी और एनसीआरबी की रिपोर्ट में दर्ज तथ्य है।

2025 में वही आँकड़ा 57 था। दो दशकों में 86 प्रतिशत की गिरावट। बीस साल का काम है। और यह अंतिम अध्याय नहीं है।

15 अप्रैल 2026 को सम्राट चौधरी ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। पहले सप्ताह की पहली कैबिनेट बैठक में उन्होंने एक वाक्य कहा जो इस सरकार की नीति का सार है: "अपराधी या तो अपराध छोड़ दें, या बिहार छोड़ दें।"

यह एक नारा नहीं है। यह एक प्रशासनिक निर्देश है। और इसके पीछे बीस साल का संस्थागत निर्माण खड़ा है।

आँकड़े जो खुद बोलते हैं

बिहार में अपराध: 2005 बनाम 2025 तीन प्रमुख संकेतक — स्रोत: NCRB, बिहार पुलिस 411 57 फिरौती के लिए अपहरण (कुल केस) 3.8 2.6 हत्या-दर (प्रति 1 लाख) 308 12 माओवादी हिंसा (कुल घटनाएँ) 2005 2025

चित्र 1: बिहार के तीन प्रमुख अपराध संकेतकों में बीस वर्षों की गिरावट।

तीन संकेतकों पर ध्यान दीजिए। पहला: फिरौती के लिए अपहरण, बिहार का "सिग्नेचर" अपराध, 411 से 57 पर। दूसरा: हत्या-दर प्रति लाख जनसंख्या, 2005 के 3.8 से घटकर 2025 में 2.6 — राष्ट्रीय औसत 2.7 से नीचे। तीसरा, और शायद सबसे महत्वपूर्ण: वामपंथी अतिवादी हिंसा (माओवादी), 2005 में 308 घटनाओं से घटकर 2025 में 12। 2005 में बिहार के 18 जिले "अति प्रभावित" की श्रेणी में थे। 2025 में केवल 1 जिला (औरंगाबाद का एक हिस्सा) उस सूची में बचा है। शेष 17 हटाए जा चुके हैं।

इन आँकड़ों को राजनीतिक चश्मे से देखने वालों के लिए एक अनुस्मारक: ये मेरे आँकड़े नहीं हैं। ये केंद्रीय गृह मंत्रालय, BPR&D, और एनसीआरबी के दस्तावेज़ हैं। राज्य सरकार चाहे किसी भी दल की हो, इन्हें न तो छिपा सकती है न बढ़ा सकती है।

बीस साल का संस्थागत निर्माण

यह गिरावट एक रात में नहीं हुई। यह संस्थागत निर्माण का परिणाम है — जो 2005 के बाद की प्रत्येक सरकार ने अलग-अलग गति से किया, लेकिन निरंतरता के साथ।

विशेष कार्य बल (एसटीएफ): 2006 में गठित। बिहार पुलिस के विशेष शाखा के तहत संगठित अपराध और चरमपंथ के विरुद्ध ख़ुफ़िया-आधारित संचालन। पंद्रह वर्षों में 200 से अधिक हार्डकोर माओवादी काडर निष्क्रिय।

पुलिस आधुनिकीकरण: केंद्रीय पुलिस आधुनिकीकरण योजना के अंतर्गत बिहार ने 2005 से 2025 के बीच लगभग 4,800 करोड़ रुपये का निवेश प्राप्त किया। डीएनए लैब, साइबर फॉरेंसिक यूनिट (हर ज़िले में), 24x7 डायल-112, बॉडी-वॉर्न कैमरे, और जीपीएस-ट्रैक पुलिस वाहन।

भर्ती: 2005 में बिहार पुलिस में लगभग 75,000 कर्मी थे। 2025 तक यह संख्या 1.27 लाख से अधिक है। महिला आरक्षण 35 प्रतिशत — किसी भी राज्य में सर्वाधिक। 2013 के बाद भर्ती हुईं महिला कांस्टेबल आज एसएचओ के पद तक पहुँच रही हैं।

अदालतों में निष्पादन: स्पीडी ट्रायल कोर्ट के माध्यम से 2006 से 2025 के बीच लगभग 78,000 आरोपी दोषसिद्ध किए गए। दोषसिद्धि दर — 2005 में 6 प्रतिशत के आसपास थी। 2025 में लगभग 35 प्रतिशत।

नई सरकार का संकल्प

सम्राट चौधरी की कैबिनेट ने पहले सप्ताह में चार ठोस घोषणाएँ की हैं। प्रत्येक एक प्रशासनिक उपाय है, राजनीतिक वक्तव्य नहीं।

एक: "ऑपरेशन शुद्धिकरण" — संगठित अपराध सिंडिकेटों के विरुद्ध 90 दिन का विशेष अभियान। चयन का आधार: संपत्ति का पैमाना, क्रॉस-स्टेट गतिविधि, राजनीतिक संरक्षण के सबूत। पहले सप्ताह में 47 केस दर्ज, 23 गिरफ़्तारियाँ, ₹68 करोड़ की संपत्ति कुर्क।

दो: सभी 38 ज़िलों में फास्ट-ट्रैक पॉक्सो और महिला अपराध न्यायालय — 12 महीने में फ़ैसला अनिवार्य।

तीन: सीमावर्ती ज़िलों (नेपाल और झारखंड बॉर्डर) के लिए विशेष ख़ुफ़िया प्रकोष्ठ। मादक पदार्थ, हथियार और साइबर अपराध के अंतर-राज्य नेटवर्क पर केंद्रित।

चार: "विट्नेस प्रोटेक्शन एक्ट, बिहार 2026" — विधानसभा के अगले सत्र में प्रस्तुत। साक्षियों के लिए कानूनी सुरक्षा, स्थानांतरण और परिवार-संरक्षण की वैधानिक व्यवस्था।

विपक्ष का तर्क और तथ्य

विपक्ष कह रहा है कि अपराध के आँकड़े "बढ़ चुके हैं"। यह गलत नहीं है — कुछ श्रेणियों में दर्ज मामले बढ़े हैं। लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म बात समझनी होगी: दर्ज मामलों का बढ़ना और घटित अपराधों का बढ़ना दो अलग चीज़ें हैं। 2005 में दर्ज न होने वाले मामले — दहेज़, घरेलू हिंसा, साइबर ठगी — 2025 में दर्ज हो रहे हैं क्योंकि थानों तक पहुँच आसान हुई है। यह अपराध-वृद्धि नहीं है। यह रिपोर्टिंग-वृद्धि है। यह दोनों के बीच अंतर समझे बिना कोई नीतिगत बहस नहीं हो सकती।

दूसरा तर्क: "बिहार में फिर से जंगल राज की वापसी"। 2005 के आँकड़े सबके सामने हैं। 2025 के आँकड़े भी। ग्राफ़ के दोनों स्तंभ देख लीजिए। "वापसी" का दावा करने के लिए पहले मूल आँकड़ा देखना ज़रूरी है। मूल आँकड़ा — 411 अपहरण, 308 माओवादी घटनाएँ, 6% दोषसिद्धि — दोबारा कहीं नहीं है।

अंतिम बात

बिहार ने एक राज्य की पहचान बदलने का काम बीस वर्षों में किया है। यह काम न पूरा है, न परिपूर्ण। संगठित अपराध के नए रूप — साइबर ठगी, ड्रग कार्टेल, सीमा-पार तस्करी — रोज़ चुनौती दे रहे हैं। महिला सुरक्षा का प्रश्न ज़मीन पर अभी भी उतना मज़बूत नहीं है जितना आँकड़ों में।

लेकिन जो रास्ता तय हुआ है वह दिखाई दे रहा है। और जो संकल्प सम्राट चौधरी सरकार ने पहले सप्ताह में लिया है, वह उसी रास्ते का अगला चरण है।

एक वाक्य फिर से: अपराधी या तो अपराध छोड़ दें, या बिहार छोड़ दें। यह नारा नहीं है। यह नीति है। और बीस वर्षों के आँकड़े साक्षी हैं।


संजय सरावगी भारतीय जनता पार्टी, बिहार प्रदेश के अध्यक्ष हैं और दरभंगा सदर से छह बार के विधायक हैं।